Writing & Publishing Workshop by Author Laxman Rao

Writing & Publishing Workshop 

by Author Laxman Rao


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Rs.5,000/- to Rs.50,000/- per month.

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Entry Fees : Rs. 500/- (Rs. Five Hundred Only)

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    Canara Bank, DDU Marg Branch, New Delhi - 110002


Topics to be discussed in the workshop:
  • How to write and finish book.
  • Discussion on publishing process.
  • How to self publish on Kindle Store.
  • How to start selling your book on Amazon and Flipkart for free.
  • Importance of marketing and promotions.
  • How to earn royalty on sale of your books.

Date    : Sunday, 6 January 2019
Time   : 4:00 pm to 8:00 pm
Venue : Hindi Bhawan (Third Floor)
             Vishnu Digamber Marg
             New Delhi - 110 002



Limited Seats Available

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Mobile No. +91 9990666043, 9210415574
Email : laxmanrao.bskp@gmail.com

What is Kindle Unlimited



What is Kindle Unlimited?
Kindle Unlimited is a service in which a subscriber is entitled to read unlimited kindle books from the Kindle Store. The kindle books which are available to read for a subscriber are those kindle books which are enrolled in Kindle Unlimited. Currently, Kindle Store has over one million kindle books enrolled in Kindle Unlimited.

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After subscribing to Kindle Unlimited, the subscriber can read unlimited kindle books enrolled in Kindle Unlimited feature. 

But he can keep up to only 10 kindle books at a time on his device. If he wants to read more than 10 kindle books he needs to return those which are already present there on his device. 

Subscriber loses the access to Kindle Unlimited books once his subscription period gets over.




How much is a Kindle Unlimited Subscription?
Monthly fees for Kindle Unlimited Subscription are as follows:

New subscribers are also entitled to Kindle Unlimited free trial in which a reader can subscribe and use this feature absolutely free for the first 30 days. The subscriber will be charged if he chooses to continue using Kindle Unlimited subscription following 30 days free trial.

Is Kindle Unlimited worth it?
This depends on many factors but the main things to be considered while choosing to subscribe Kindle Unlimited are as follows:
  1. The number of kindle books a reader can read in a month
  2. The maximum amount a reader is willing to spend on the kindle books in a month

Let’s take an example.

Suppose a person reads around 10 kindle books in a month and he is willing to spend a maximum amount of US $ 20 per month. If he subscribes to Kindle Unlimited, he will have to spend only half the amount i.e. the US $9.99 and will have the access to over one million kindle books enrolled in Kindle Unlimited. And he wouldn’t have to spend a single penny for the first one month thanks to Kindle Unlimited free trial.

Hence it will be feasible for that reader to subscribe to Kindle Unlimited and he can opt out of this subscription whenever he chooses to do so.



Author Laxman Rao's Kindle Books  
As author Laxman Rao’s all kindle books are enrolled in Kindle Unlimited, you can enjoy reading all of them absolutely free after subscribing to Kindle Unlimited service. 

But if you purchase all the kindle books authored by Laxman Rao, it would cost you INR 625 (5 kindle books x Rs.125/- = Rs.625/-).  

After subscribing, your Kindle Unlimited free trial will start in which you can read author Laxman Rao’s all kindle books for free.


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दंश - सामाजिक घटनाओं पर आधारित प्रेरणात्मक उपन्यास


परमजीत उच्च शिक्षा ग्रहण करने पंजाब से पूना आता है. यहां उसकी भेंट लता मैडम से होती है. लता मैडम भी पंजाब से ही थीं, इसलिए दोनों में घनिष्ठता बढ़ती जाती है. लता मैडम की छोटी बहन नंदिनी आंशिक रूप से लकवाग्रस्त होती है जिसे नियमित रूप से थैरपी सेंटर ले जाना पड़ता था. इसलिए लता मैडम परमजीत से अनुरोध करती हैं कि वह नंदिनी को थैरपी सेंटर ले जाया करे.
 
जब परमजीत नंदिनी को थैरपी सेंटर ले जाना शुरू करता है तो नंदिनी एक घर के सामने टैक्सी रुकवाकर बहुत देर तक उस घर की तरफ देखती रहती और कभी हंसती, कभी रोती तो कभी भावुक हो जाती थी. फिर उस घर से कुछ दूर एक खण्डहर हो चुके मकान के सामने भी रूकती और उसे देखती रहती. कई दिनों तक यही क्रम चलता रहा. 
धीरे-धीरे परमजीत को यह आभास होने लगता है कि नंदिनी के जीवन में अवश्य ही कोई अप्रिय घटना घटी है जिसके फलस्वरूप नंदिनी की आज यह अवस्था है. यही नंदिनी के जीवन का सबसे बड़ा दंश है. 
परमजीत ठान लेता है कि वह नंदिनी के जीवन के पूर्व इतिहास का पता लगाएगा और नंदिनी के जीवन को संवारने का प्रयास करेगा.

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1
कुछ ही दिनों में वहां मेरा मन लग गया। पढ़ाई के साथ नौकरी भी आराम से कर रहा था। जिस कपड़े के शोरूम में मैं काम कर रहा था उसमें काम करते हुए मुझे तीन महिने हो चुके थे और तीन महिने कब बीत गये पता ही नहीं चला। उन तीन महिनों में मैंने अपनी योग्यता दिखाकर सबका दिल जीत लिया था। जो कर्मचारी मुझसे सीनियर थे वे भी मुझे सम्मान देते थे। सेठ साहब तो कभी-कभी मुझे गल्ला सम्भालने का काम भी दे देते थे। इतना विश्वास वे मुझ पर करने लगे थे।
जब कभी मैं गल्ले पर बैठता था तो कुछ लोगों की मुझ पर बहुत नज़र रहती थी। जैसे कि उसी शोरूम के बाहर एक चाय की दुकान थी। उस चाय की दुकान पर चार-पांच लड़के चाय पीने आते थे। उनकी हरकतों से ऐसा लगता था जैसे वे लोग मुझ पर नज़र रख रहे हों। जब भी मैं उस चाय की दुकान पर चाय पीने जाता था तो वे एक-दूसरे को इशारा करते हुए मुझे देखते रहते थे। उन लोगों के इस व्यवहार के कारण मुझे उन लोगों पर शंका होने लगी थी।
वे चारो-पांचों लड़के पच्चीस से तीस वर्ष की उम्र के थे, परन्तु पढ़े-लिखे बिल्कुल नहीं लगते थे और बन-ठन कर रहते थे। अब मुझे उनसे डर भी लगने लगा था। उनमें महेश नाम का जो एक लड़का था वह मेरे साथ बात करने का भी प्रयास करता था। वे सब मेरा नाम भी जानते थे।
अधिकतर उनका चाय की दुकान पर आना शाम के छह बजे होता था और उसी समय मैं भी चाय पीने के लिए उसी दुकान पर जाता था।
एक दिन वे चारों-पाचों लड़के चाय की दुकान पर कप हाथ में लेकर चाय की चुस्कियां लेते हुए आपस में बातचीत कर रहे थे कि मैं वहां पहुंच गया। वे एकटक मेरी तरफ़ देखने लगे।
मैंने चाय वाले से कहा—“एक चाय देना।”
चाय वाले ने गर्दन से ईशारा किया “दे रहा हूं।” और मैं इधर-उधर देखता हुआ खड़ा रहा। तभी उन लड़कों में से एक ने कहा—“कैसे हो परमजीत?” मैंने उसकी तरफ़ देखा। वह महेश था। आगे बोला—“काम धंधा ठीक चल रहा है न परमजीत?”
मैंने कहा—“बहुत बढ़िया।”
कहने लगा—“बहुत बढ़िया मत कहो यार ! टाइम पास हो रहा है, यह कहो।”
मैंने कहा—“यह भी कह सकते हो।”
इतने में चाय वाले का कर्मचारी मेरे लिये एक कप चाय लाकर मुझे देने लगा। मैंने चाय का कप अपने हाथ में पकड़ा और पीने लगा। इसके साथ-साथ वे चारों-पांचों लड़के मुझसे क्रमानुसार बातचीत करने लगे। किसी ने मेरा गांव पूछा, किसी ने मेरा पूना आने का कारण पूछा, आदि-आदि। पर एक ने तो कह दिया—“अरे यार ! तुम छोड़ दो इस नौकरी को। हमारे साथ जुड़ जाओ। तुम्हारी ज़िन्दगी बन जायेगी।” मैं उनकी हर बात समझ रहा था पर वे मुझसे क्या चाहते हैं, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था।
मैंने कहा—“भाई जहां मैं नौकरी कर रहा हूं, यह काम भी आसानी से मिल सकता है क्या?”
उनमें से रमन नाम का लड़का बोला—“यह तो तुम ठीक कह रहे हो, पर हमारे पास तुम्हारे लिये इससे भी बढ़िया काम है। तुम हिन्दी बहुत अच्छी बोल लेते हो और तुम्हारे शरीर की कद-काठी भी बहुत अच्छी है। हमें तो तुम्हारे जैसे ही लड़के की तलाश थी।”
हमारा वार्तालाप जारी था, इतने में ही दुकान से लड़का आया और बोला—“परमजीत जल्दी चलो, सेठजी बुला रहे हैं।” मैंने चाय का कप वहीं बेंच पर रखकर चाय के पैसे दिये तथा शोरूम की तरफ जाने लगा।
उन्हीं लड़कों में से सुरेश नाम का लड़का बोला—“हमारी बातों पर आपने ध्यान नहीं दिया परमजीत।”
मैंने कहा—“हां-हां देखेंगे।” यह कहकर मैंने घबराते हुए शोरूम में प्रवेश किया। उस समय शोरुम में एक पंजाबी परिवार कपड़े खरीदने आया था। इसलिये सेठजी ने मुझे बुलाया था। यह जानकर मेरी घबराहट कुछ कम हुई।
चार-पांच दिनों के बाद फिर एक बार उन लड़कों ने मुझे घेर कर मुझसे बातचीत करनी चाही। वे मुझे अपने साथ जोड़कर अपना काम बांटना चाहते थे पर काम क्या है यह उन्होंने तब तक नहीं बताया था और न ही मुझे पता चला था। उनकी बातों से मुझे वे ईमानदार व शरीफ तो नहीं लग रहे थे और मैं उनके साथ काम करुं यह मैं सोच भी नहीं सकता था, परन्तु वे मुझे बार-बार प्रलोभन दे रहे थे और मेरे साथ सहानुभूति भी दिखा रहे थे।
2
वे लोग मुझसे क्या चाहते हैं यह कल्पना करना असंभव था। मैंने चाय वाले से कहा—“क्या आप मेरा एक काम करोगे?”
कहने लगे—“बोलो।”
मैंने कहा—“वे लोग मेरे प्रति क्या भावना रखते हैं, इसका पता करना है। क्या आप पता कर सकते हो?”
चाय वाला बोला—“तुम्हारे बारे में वे क्या सोच रहे हैं, इसकी जानकारी मुझे बहुत दिनों पहले ही लग चुकी है।”
मैंने आश्चर्य से पूछा—“अच्छा! क्या चाहते हैं वे लोग मुझसे?”
चाय वाला बोला—“तुम्हारे बारे में वे अच्छा सोच रहे हैं पर तुम उन लोगों के बीच में मत पड़ना।”
मैंने पूछा—“ऐसा क्यों लालाजी?”
बोले—“भाई तुम शरीफ और परदेसी लड़के हो। इनके साथ रहकर तुम भी शराफत भूल जाओगे।”
मैंने कहा—“धन्यवाद लालाजी!” यह कहकर मैंने लाला का आभार व्यक्त किया।
उन लड़कों से मेरी एक-दो दिनों के अंतराल पर भेंट होती रहती थी। उनमें से एक लड़का मुझे शरीफ लगता था। उसका नाम सुरेश था। उससे मेरी दोस्ती बढ़ने लगी। उसने मुझे सारी जानकारी दे दी। वे लोग न तो बदमाश थे न ही बेकार थे। परन्तु जैसा आदमी मिला, वे उससे उसी हिसाब से बात करते थे। मुझे वे अपने साथ इसलिये जोड़ना चाहते थे कि मैं उनके साथ जुड़कर उनके व्यापार में विस्तार करूं।
उनमें एक लड़का था ‘सूरज’। वह सब लड़कों का बॉस था। उसने तीन लड़के वेतन पर रखे हुए थे। तीन लाख रुपये दस प्रतिशत ब्याज पर कारखानों के मज़दूरों को दे रखे थे।
एक दिन सूरज भाई ने मुझे पकड़ लिया। मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझसे बात करने लगे। मेरे जीवन की सारी जानकारी उन्होंने ले ली। सप्ताह में दो दिन अपने साथ काम करने का अनुरोध किया और मैंने स्वीकार भी कर लिया। दो दिन अर्थात् शनिवार और रविवार।
मैं लगातार दो महिने तक उनके साथ काम करता रहा। सूरज भाई और उनके तीन साथियों को मैंने अच्छी तरह से समझ लिया था।
वे चारों ही शरीफ थे, पर धंधा ऐसा था की गन्दी गाली देना, तू-तड़ाक बोलना और समय आने पर थप्पड़ मारना यह सब होता था। दो महिने में उन्होंने मुझे बत्तीस ग्राहक दे दिये जो उनके पुराने ग्राहक थे। उनमें से चार-पांच पंजाबी व आठ-दस उत्तर प्रदेश व बिहार से थे।
3
सूरज, महेश, रमन और सुरेश चारों ही मेरे अच्छे मित्र बन गये थे। उन चारों से मेरा मन लग गया था। वे चारों मेरा बहुत सम्मान करते थे। आरम्भ में मैं जैसे उन्हें बदमाश-आवारा समझ रहा था, वे वैसे नहीं थे। उनका रहन-सहन, हाव-भाव व बोलचाल बदमाशों जैसा था। किन्तु स्वभाव से बहुत अच्छे थे। सूरज भाई को मैं ‘सूरज भाई’ कहकर सम्बोधित करता था क्योंकि वह हम सबके बॉस भी थे और आयु में भी हम सबसे 5-6 वर्ष बड़े थे।
उनके वार्तालाप में एक बात मुझे रहस्यमय लगती थी-‘दो बटा साठ’। उन सबके मुंह से ‘दो बटा साठ’ सुनकर मुझे एक विचित्र आभास होता था। मैंने उन चारों से कई बार पूछा भी कि यह ‘दो बटा-साठ’ क्या है? पर सभी ने इसे हंस कर टाल दिया। सूरज भाई से जब मैंने पूछा तो वह भी कहने लगे—“छोड़ो यार परमजीत, तुम जानकर क्या करोगे?”
लेकिन मैं इस रहस्य को अवश्य जानना चाहता था और इसी जिज्ञासा के कारण मैं असमंजस में था।
एक दिन जब मैं शोरूम से आपने कमरे पर जाने के लिए निकला तो किसी ने पीछे से मेरे कन्धे पर हाथ रखा। वह सूरज भाई थे, मैंने आश्चर्य से देखकर उनसे पूछा—“हां जी भाई साहब, इस समय यहां कैसे?”
सूरज भाई बोले—“चलो पहले चाय पीते हैं, फिर हमें एक जगह जाना है। उसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे पर छोड़ दूंगा।”
हम चाय की दुकान पर गये, वहीं पर सूरज भाई ने अपना स्कूटर खड़ा कर रखा था। चाय का ऑर्डर देकर स्कूटर की डिक्की खोलकर उसमें से नोटों की गड्डियां निकालकर लाए और हम दोनों नोटों की गिनती करने लगे। हम दोनों नोटों की गिनती कर रहे थे और राह चलते लोग हमें देखते हुए जा रहे थे, पर सूरज भाई को कोई डर नहीं था। बीस हज़ार रुपये थे। यह बात सन् 1978 की है। 1978 में बीस हज़ार रुपये बहुत होते थे।
हमने चाय पी और फिर स्कूटर पर बैठकर जाने लगे। चार-पांच किलोमीटर चलने के बाद एक पॉश कॉलोनी आ गई। उस कॉलोनी में एक सुन्दर सी कोठी के सामने सूरज भाई ने स्कूटर खड़ा कर दिया। मुझसे कहने लगे- ‘‘तुम यहीं पर ठहरो। मैं रुपये देकर आता हूं। उन्होंने डिक्की में से नोटों की गड्डियां निकालीं और रूमाल में लपेट कर अंदर ले गए।
मैं प्रतीक्षा करते हुए गेट के बाहर खड़ा रहा। अचानक मेरी नज़र उस कोठी के नंबर पर पड़ी। लिखा था-'दो बटा साठ’ (2/60)। मैं चौंक गया। सूरज भाई व उनके अन्य साथी कई बार इसी कोठी के विषय में बातचीत करते थे। मैं गौर से उस कोठी के चारों तरफ देखने लगा। उसमें रहने वाले कुलीन परिवार के सदस्य थे। कोठी का रंग-रूप एवं नक्शा बहुत सुंदर था। सूरज भाई जैसे धनी लोग ही उस कोठी में प्रवेश कर सकते हैं, यह मेरा अनुमान था।
इसलिए सूरज भाई इस कोठी में मुझे नहीं भेजते थे। उनके साथ चार महीने काम करने के बाद आज पहली बार इस कोठी के दर्शन करने को मिले।
पच्चीस मिनट के बाद सूरज भाई लौट आए। पर उनके चेहरे पर रौनक नहीं थी। वह मायूस नज़र आ रहे थे। न ही वह कुछ बोल पा रहे थे और न ही वह कुशलता से आगे बढ़ रहे थे। मैं उनसे कोई प्रश्न करूं इससे पहले ही वह स्वयं बताने लगे।
बोले—“आज तो नुकसान हो गया परमजीत! सोचा भी नहीं था कि ऐसा नुकसान होगा।”
“क्या हो गया भाई साहब?”- मैंने पूछा।
आगे वह कहने लगे—“बीस हज़ार रुपये देकर मैंने उनसे एक लाख रुपये की डिमाण्ड की। उन्होंने मना कर दिया। लता मैडम बोलीं कि पहले आपकी तरफ जो दो लाख रुपये हैं उसे जमा कर दो। उसके बाद नया खाता खोल लिया जायेगा।”
मैं कुछ सोचकर सूरज भाई से कहने लगा—“कोई बात नहीं भाई, एक घर में मना कर दिया तो बाकी के घर के दरवाज़े तो खुले हैं। आप तो कहीं से भी प्रबन्ध कर सकते हो।”
वे बोले—“नहीं परमजीत! ऐसा नहीं है। इसी घर से हमने व्यापार सीखा है और इसी घर के सहारे मैंने लाखों रुपये कमाए हैं।”
मैंने कहा—“मैं कुछ समझा नहीं सूरज भाई।”
कहने लगे—“तुम्हें समझाने में बहुत समय लगेगा परमजीत। समय के साथ सब समझ जाओगे।”
मैं अधिक पूछताछ नहीं कर सकता था। जो वह बताते जा रहे थे, उतना ही मैं सुन सकता था। सूरज भाई का उदास होने का कारण उनकी निजी समस्या थी। हम दोनों स्कूटर पर बैठे और अपने घर जाने लगे। वे मुझे कमरे पर छोड़कर चले गये। अब महिने में दो बार सूरज भाई मुझे दो बटा साठ में रुपयों की किश्त लेकर भेजते थे। कभी-कभी वह मुझे अपने स्कूटर पर बिठाकर ले जाते थे और वह कुछ दूरी पर खड़े रहते थे। जब मैं किश्त देकर आता था तो वे मुझसे उस घर की एक-एक बात पूछते थे। मुझसे पूछताछ करके जो कुछ वह सुनते थे उस पर वह बहुत देर तक चिंतन करते थे।
जिसे सूरज भाई लता मैडम बोलते थे, उस महिला की उम्र भी सूरज भाई की उम्र के बराबर ही थी और उस घर में मैं जितनी बार भी गया, उतनी बार वही महिला मुझे मिली। परन्तु उन्होंने मुझे घर के भीतर कभी प्रवेश नहीं दिया।
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मैं घर के आंगन का फाटक खोल कर घर के मेन गेट तक जाता था, घंटी बजाता था, दो मिनट में वह महिला आती थी और पैसे लेकर मेरी डायरी में हस्ताक्षर करती थीं। वह तब तक गेट पर खड़ी रहती थीं जब तक मैं आंगन पार करके फाटक के बाहर नहीं चला जाता था। तीन-चार बार ऐसा ही हुआ।
एक दिन मैं रात के समय वहां गया। उस समय रात्रि के आठ बज रहे थे और बारिश भी बहुत हो रही थी। मैं पूरी तरह भीग चुका था। फाटक खोलकर जैसे ही मैं आंगन में प्रवेश करने लगा तो मेरी नज़र पहली मंज़िल की खिड़की पर पड़ी। लाईट जल रही थी और एक सुन्दर लड़की खिड़की में खड़ी होकर बाहर होने वाली बारिश का आनंद ले रही थी। सम्भवतः उस लड़की ने जैसे ही मुझे गेट से आते हुए देखा तो उसने कमरे की बत्ती बुझा दी। उजाले में जो उसकी सुंदरता दिखाई दे रही थी, बत्ती बुझते ही उसकी सुंदरता अंधेरे में लुप्त हो गई।
मैं कोठी के दरवाज़े के पास जाकर खड़ा हो गया और बेल बजाकर छज्जे के नीचे खड़ा होकर अपने बदन का पानी हाथ से साफ करने लगा। पल दो पल में ही भीतर से महिला ने दरवाज़ा खोला। मैंने उनको पैसे, डायरी व पेन दिया और वह रकम गिनकर डायरी में लिखने लगीं। 

पूरा उपन्यास पढ़ने के लिए अभी डाऊनलोड करें - DANSH (Hindi): Samajik Ghatnao Par Aadharit Prernatmak Upanyaas  

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स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता नए रचनात्मक सरोकार



23-24 मार्च, 2017 को दिल्ली विश्वविद्यालय के पी॰जी॰डी॰ए॰वी॰ कॉलेज (सांध्य) में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ था। यह आयोजन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सौजन्य से था। 


इस संगोष्ठी का विषय था – ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता नए रचनात्मक सरोकार’। इस विषय पर बड़े आकार की पुस्तक भी प्रकाशित हुई थी और उसके चौथे भाग का विशेष अंक प्रकाशित कर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया था। 

प्रकाशक संस्थान का नाम था ‘साहित्य संचय’ तथा संयोजक एवं सम्पादक थे डॉ॰ हरीश अरोड़ा जी। श्री हरीश अरोड़ा जी पी॰जी॰डी॰ए॰वी॰ कॉलेज (सांध्य) में प्राध्यापक हैं।

‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता नए रचनात्मक सरोकार’, इस 216 पृष्ठ की पुस्तक को पढ़कर मुझे ऐसा लगा कि हिन्दी भाषा का स्तर बहुत ऊंचा है और हिन्दी भाषा के विद्वान निरंतर प्रयास में रहते हैं। वस्तुतः वर्तमान में हिन्दी भाषा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से निकलकर देश के जन-जन तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। श्री हरीश अरोड़ा जी ने अपने सम्पादकीय में लिखा है –“पुराने प्रतिमानों और विचारों की पृष्ठभूमि पर खड़ी कविता नई अवधारणा को लेकर अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रही है।” 

साथ-साथ उन्होंने एक बहुत बड़े विद्वान का नाम लेते हुए कहा - “टॉलस्टॉय ने कहा था कि दिन-प्रतिदिन प्रत्येक वस्तु एवं जीवों में निरंतर परिवर्तन हो रहा है, परंतु आवश्यकता मात्र इतनी ही है कि अपने को निश्चित एवं कायम रखने के लिए उसकी नीव सुदृढ़ बनाना आवश्यक है।” 

विशाल आकार की इस पुस्तक में 57 विद्वानों ने लेख लिखकर अपने विचार व्यक्त किए हैं। इनमें कुछ विश्वविद्यालय के प्राध्यापक हैं तो कुछ हिन्दी भाषा विभाग के शोधार्थी भी हैं। विशेष बात यह है कि जिन्होंने लेखों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किए हैं, उनमें से कुछ विद्वान तो उर्दू भाषी हैं। यह जानकर व पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई की उर्दू भाषी विद्वान लोग भी हिन्दी भाषा को दिल से जोड़कर रखने की आस्था रखते हैं। 

गुलशन बानो ने आपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है – “समकालीन कवि स्वतन्त्रता के बाद बदले हालातों को बखूबी समझ चुका है। जिस व्यक्ति के पास धन है वही शक्तिशाली है।” डॉ॰ गुलशन बानो असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। 

ज़रीना दीवान ने लिखा है – “स्त्री विमर्श की क्रांति यूं ही नहीं आई। इसके लिए स्त्रियों को अपने कदम बढ़ाने के लिए बरसों बीत गए।” ज़रीना दीवान जामिया मिलिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं। 

डॉ॰ नाजिश बेगम ने लिखा है -  “समकालीन हिन्दी कविताओं में स्त्री जीवन की पीड़ा एवं संघर्ष व्यक्त करते हुए कुछ अनसुलझे पहलुओं पर भी विशेष प्रकाश डाला गया है। डॉ॰ नाजिश बेगम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ से हैं। 

अंबरीन आफताब ने लिखा है – “सन 1960 के पश्चात ही कविता में परिवर्तन के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।” अंबरीन आफताब भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से हैं।” 

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के डॉ॰ मुनिल कुमार वर्मा जी लिखते हैं – “नवगीत की परिभाषा क्या है? नवगीत हिन्दी कविता की विकासशील परंपरा है। ‘नव’ यह शब्द सभी अपरिभाषित विशेषताओं के बिलकुल निकट है।”

जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज से डॉ॰ निशा मलिक कहती हैं – “आज का साहित्य जब जीवन के यथार्थ को व्यक्त करना चाहता है तो कवि को सजगता तथा विशेष अनुभवों के साथ अपने काव्य को तथ्यों एवं संदर्भ के साथ रखना पड़ता है।” 

विवेकानंद कॉलेज से डॉ॰ ओमवीर सिंह ने अज्ञेय का बिम्ब विधान प्रस्तुत करते हुए लिखा है – “बिम्ब की कोई जाति या प्रकार ऐसा नहीं है जो उनकी रचनाओं में प्राप्त न होता हो।”

विवेकानंद कॉलेज की डॉ॰ पूनम जी स्मृति की परिभाषा रेखांकित करते हुए कहती हैं – “स्मृति को ज़िंदा रखने का सबसे सुंदर एवं जीवंत माध्यम कविताएं हैं।” 

स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज से डॉ॰ राकेश जी स्त्री विमर्श के संबंध में कहते हैं - “भारतीय समाज में बेटी के जन्म पर खुशी न मनाए जाने का कारण दहेज प्रथा है। इस सबसे बड़े कारण से ही कन्या भ्रूण हत्या को अधिक बढ़ावा मिला है।” 

इस पुस्तक में सभी विद्वानों ने बहुत सुंदर व बहुत अच्छा लिखा है। विशेषतः प्रत्येक रचनाकार ने रचना समाप्त होने के बाद संदर्भ सूची भी प्रस्तुत की है जो एक संस्मरण एवं साभार के लिए आवश्यक है। 

सभी लेखों के बाद की संदर्भ सूची पढ़कर ऐसा ज्ञात होता है कि हिन्दी साहित्य की पृष्ठभूमि विशाल रूप धारण  कर चुकी है। 

संदर्भ सूची में पुस्तकों के नाम तथा उन पुस्तकों के रचनाकारों एवं पुस्तक कहाँ से प्रकाशित की गई, उस प्रकाशन संस्थान का नाम देकर पाठकों लिए यह जानकारी दी है कि साहित्य का आकार बहुत बड़ा है। जितना पढ़ोगे उतना ही कम है और जो प्राप्त है उसे अवश्य पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। 

श्री हरीश अरोड़ा जी का बहुत-बहुत अभिनंदन जिन्होंने उच्चकोटी के रचनाकारों द्वारा लिखित लेखों को संकलित कर पुस्तक को एक नया रूप दिया। जिन विद्वानों ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता नए रचनात्मक सरकोर’ इस पुस्तक में लेख लिखा है उनके नाम हैं:
आशा रानी, अंजली जोशी, भावना, चारु रानी, दीपा, देविन्दर सिंह, ऋषिकेश सिंह, ज्योति, कंचन शर्मा, कांता देवी, कविता बिष्ट, कुमार धनंजय, कुसुम सिंह, लक्ष्मी देवी, महेश चंद, मंजरी गुप्ता, मनीष ओझा, मनोज सतीजा, मोहसीना बानो, नीरू मान, प्रवीण देवी, प्रिया कौशिक, प्रियंका सिंह, रमेश कुमार, रश्मि शर्मा, रवि कुमार, सगीर अहमद, संतोष कुमार भारद्वाज, सरोज कुमारी, सीमा शर्मा, श्रवण कुमार, शौर्यजीत, श्रुति रंजना मिश्रा, स्नेहलता, सोनम खान, सुनील कुमार यादव, स्वाती मौर्या, विशाल कुमार यादव, विष्णु, सरस्वती मिश्र, मीना शर्मा, अभिषेक विक्रम, नेहा, हीना कुमारी, अशोक कुमार, मिलन बिश्नोई, गुंजन कुमार झा, चन्द्रकान्त तिवारी। 
   
हिन्दी भाषा के प्रति जिज्ञासा एवं अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने हेतु आप सब को हार्दिक शुभेच्छा। 


- साहित्यकार लक्ष्मण राव

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